Friday, 14 April 2017

पूंजीवादी सड़ांध

पूंजीवादी सड़ांध. संस्कृति, धर्म, जाति, देशवाद, अध्यात्म हर जगह सडन की बू है. रिसते, जहरीले मवाद दिख रहे हैं. 
पूंजीवादी उत्पादन गहरे संकट में है. पहले तो हर आर्थिक मंदी या संकट के बाद आर्थिक उफान नजर आता था, पर 2008 के बाद तो यह संकट पुरे विश्व में ठहर सा गया है. भयानक बेरोजगारी, महंगाई हर जगह व्याप्त है. आतंकवाद और युद्ध तक इसी का नतीजा है.
मजदुर वर्ग और किसान भी विरोध में सडकों पर आये. यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका, भारत, आदि में करोड़ों में प्रदर्शन भी हुए. कुछ वर्ग संघर्ष को भी अग्रसर हुए, यानि राज्य सत्ता को हस्तगत करने की कोशिश हुई, पर क्रन्तिकारी पार्टी ना होने की वजह से यह आन्दोलन हर जगह असफल रहा!
पूंजी के सत्ता ने पलट वार की. फासीवादी रुझान ही नहीं बल्कि इसका गन्दा, खुनी रूप हमारे बीच में आया! जनता के बिच से 10-15% बेरोजगार, लम्पट और मूढ़ तत्व इसके साथ हो लिए, पैसे भी मिलते हैं इनको इस जघन्य कार्य के लिए.
नतीजा? पूंजीवादी उत्पादन का तो पतन है ही, उत्पादन शक्तियों का, यानि, मजदूरों, मशीनों का भी क्षय हो रहा है! जो समाजवाद का विरोध करते हैं, वह यह सोचते हैं की निजी पूंजी ख़त्म हो जाने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता ख़त्म हो जायेगा, वह यह नहीं देख पाते की कैसे पुन्न्जिवाद में व्यक्तिगत स्वतंत्रता है ही नहीं. बेरोजगारी, बेईज्ज़ती सामान्य है. सुबह से शाम तक 6-7 दिन तक खटो, तब जाकर 3 वक्त का भोजन मिल पता है. भारत में तो 18-20 करोड़ तो बेरोजगार हैं!
पूंजीवाद की ठहराव अब विनाश में बदल चूका है. विकास की बात करने वाले, चाहे नितीश, मोदी या फिर आप वाले हों, भोले हैं, या फिर जनता को धोखा दे रहे हैं! इस विनाश का असर फासीवाद है, यानि विद्रोह को दबाने का पूंजीवाद का राक्षसी रूप! अमेरिका, यूरोप में भी दिख रहा है!
इस फासीवादी राक्षस के विरुद्ध लड़ाई वापसी नहीं यानी पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को सुन्दर बनाना नहीं बल्कि समाजवादी व्यवस्था लाना ही एकमात्र सफल लड़ाई होगी. यदि यह जहर बचा रहा, यानि इसका आधार पूंजी बचा रहा तो इसकी वापसी होगी, और भी भयानक रूप में. लडाई मजदुर वर्ग की एकता और संघर्ष ही साधन है!

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