Saturday, 15 October 2016

संघ के फासीवाद के पूर्ण विजय के रास्‍ते की अड़चने .........

सर्वहारा अखबार
संघ के फासीवाद के पूर्ण विजय के रास्‍ते की अड़चने और भारत में फासीवाद को लेकर कम्‍युनिस्‍ट कैंप में बहस : एक संक्षिप्‍त हस्‍तक्षेप और सार संकलन
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आज यह स्‍पष्‍ट हो चुका है कि भारत में फासीवाद का मुख्‍य वाहक भाजपा और संघ है और इसीलिए इसका मुख्‍य खतरा राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और अणुषंगी संगठनों की ओर से ही है। इसलिए आइये, सबसे पहले हम इस पर विचार करते हैं कि भारत में संघी फासीवाद के रास्‍ते की वे अड़चने क्‍या हैं जिनकी चर्चा अक्‍सर हम सभी करते हैं और उसका अर्थ क्‍या है। हम पाते हैं कि मौजूदा परिस्थिति में भारतीय फासीवादियों के रास्ते की एक बड़ी अड़चन अगर कोई है तो मोदी सरकार स्वयं है। मोदी ने जनता से अत्‍यंत ही बड़े-बड़े और अतार्किक वायदे किये थे। फासीवादियों की यही तो फितरत है कि वे बड़े और झूठे सपने दिखाते हैं। जनता को रिझाने का यही उनका मूल हथियार है। हम पाते हैं कि चुटकी बजाते अच्‍छे दिन लाने और सभी के खातों में 15-15 लाख रूपये जमा कराने के वायदे आज सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की जो हालत है और पूरे विश्‍व में जो आर्थिक मंदी और संकट की स्थिति है, वह भी मोदी सरकार के लिए मुसीबत बनी हुई है। लाख कोशिश के बाद भी 'स्‍टार्ट अप इंडिया' स्‍टार्ट नहीं हो रहा है। 'मेक इन इंडिया' भी स्‍टार्ट अप की समस्‍या से जुझ रहा है। परिणामस्‍वरूप मोदी सरकार जनता को दिखाए बड़े सपनों (जैसे प्रति वर्ष 2 करोड़ रोजगार पैदा करने का सपना) का दशांश भी पूरा करने की स्थिति में नहीं है और बहुत तेजी से जनता के बीच उसकी पोलपट्टी खुलती जा रही है। यह इनकी सबसे बड़ी अड़चन है। लेकिन ध्‍यान देने की जरूरत यह है कि वे इस अड़चन को निपटने के लिए और भी अधिक तेजी से राष्‍ट्रवाद और उग्र राष्‍ट्रवाद तथा ऐसे ही अन्‍य मुद्दों को उठायेंगे और उठा रहे हैं।
लेकिन एक दूसरी बड़ी बाधा, जिसकी गूँज कम्‍युनिस्‍ट कैंप में खूब है, भारत की सामाजिक बनावट है। इनका कहना कुछ इस प्रकार है – '' यह बनाबट ऐसी है जिसमें इन शक्तियों को दलित जातियों के बीच अपनी विचारधारा की पैठ बनाने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। इसके खुले व पारंपरिक समर्थक उच्च जाति और वर्ण के हैं। ये दलितों के प्रति अपनी घृणा को बहुत दिनों तक छुपा कर नहीं रख सकते। मौका मिलते ही ये दलितों पर पुराने वर्चस्व के लिए उग्र रूप से उत्पीड़न का सहारा लेते हैं और ले रहे हैं। इससे फासीवादियों का पूरे समाज का फासिस्‍टीकरण करने में बाधा आती है और आ रही है। संघी फासीवादि‍यों के प्रतीकों के निशाने पर महज मुसलिम और क्रिश्चियन ही नहीं दलित, आदिवासी और पिछड़े भी आते हैं। यानि यह सब मिलकर एक बड़ी बाधा खड़ा करते हैं। इसका प्रभाव यह पड़ता है कि यह सरकार फासिस्ट प्रचार के प्रति दलित आबादी के बीच आकर्षण बनाए रखने में अंतत: नाकाम हो रही है और होगी।''
लेकिन जमीनी स्थिति यह है कि पिछड़े और दलितों के बीच आर्थिक नवउदारीकरण के बाद जो पूँजीवादी संस्‍तर निर्मित हुआ है, वह संस्‍तर आज तेजी से संघ के फासीवाद का पैरोकार बन रहा है। बल्कि यह कहना उचित होगा कि बन चुका है। वह उच्‍च जातियों में परंपरागत रूप से मौजूद फासीवाद समर्थक बुर्जुआ संस्‍तर का विरोध करने में नहीं उससे प्रतिद्वंद्विता करने में गौरवान्वित महसूस करता है। वह संघी राष्‍ट्रवाद की संकुचित अवधारणा को आसानी से स्‍वीकार करता है। बड़ी पूँजी के हितों से इनका आज पूर्ण विलय हो चुका है। अठावले से लेकर रामविलास पासवान और मायावती तक सभी के सभी संघ के राष्‍ट्रवाद से 'एडजस्‍ट' करके चलने में विश्‍वास करते हैं हम यह जानते हैं। आज हम अगर गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगे से लेकर मुजफ्फरनगर और दादरी तक का विलेषण करें, तो हम इस बात से आश्‍वस्‍त नहीं हो सकते हैं कि संघ के उग्र राष्‍ट्रवाद और फासीवादी-सांप्रदायिकत घृणा की पहुँच दलित तबकों के अंदर नहीं गया है। दलितों के अंदर मजबूत हो चुका यह घोर पूँजीवादी संस्‍तर बखूबी इस काम को अंजाम देने में लगा है। फासीवादी शक्तियाँ लगातार इसके लिए सोशल इंजीनियरिंग में लगी हैं। जिस तरह से आजकल कल के मायावती मार्का बड़े दलित नेता भाजपा का रूख कर रहे हैं, वह इस और मजबूती से इशारा कर रहा है। आज कल जिस तरह से पाकिस्‍तान विरोध की धुरी पर पनप रहे संघी राष्‍ट्रवाद की हवा चली है उसमें हम सभी जातियों के बुर्जुआ स्‍ंस्‍तर की संलिप्‍तता आसानी से देख सकते हैं। जेएनयू में 'बापसा' मार्का दलितवाद भी इसी ओर इशारा कर रहा है। 'भगत सिंह और अंबेदकर के रास्‍ते' जैसे नारे के जरिये सीपीआई-सीपीएम-लिबरेशन मार्का (संशोधनवादी-अवसरवादी) कम्‍युनिस्‍टों ने जिस तरह से बुर्जुआ पार्टियों की सोशल इंजिनियरिंग की भोंडी नकल की, उसका सीधा प्रत्‍युत्‍तर आज 'बापसा' जैसे संगठन हैं जिसके पीछे दरअसल दलित आबादी के बीच नये-नये पनपे वे बुर्जुआ संस्‍तर खड़े हैं जिनकी हमने ऊपर बात की है। ऊना आंदोलन से निकले जिग्‍नेश जैसे नये दलित नेता किस खाते में जाते हैं इसकी कुछ बानगी मौजूद हैं लेकिन अभी पूरी तरह कुछ भी कहना मुश्किल है।
इस तरह फासीवादी ताकतें लगातार इन बाधाओं से निपटने के लिए तेजी से नयी-नयी साजिशों में लिप्‍त हो रही हैं। वे अपनी हिंदू राष्‍ट्रवाद की विचारधारा में और जातिवाद के विमर्श भी तेजी से इतिहास के पुनर्लेखन के जरिये नये आयाम जोड़ने में लगी हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी वे आने वाली बाधाओं को नि‍पटने की कोशिश में लगे हैं हालाकि इसकी उम्‍मीद कम ही है। लेकिन उनकी छटपटाहट स्‍पष्‍ट रूप से देखी जा सकती है। चाहे छद्म रूप से ही क्‍यों नहीं, लेकिन विकास, भ्रष्टाचार व कालाधन और रोजगार जैसे मोर्चे पर मोदी सरकार "कुछ न कुछ" करते दिखना चाहती है। अंतत: ये राष्‍ट्रवाद का सहारा लेंगे और ले रहे हैं। यह इनके लिए ज्‍यादा मुफीद प्रतीत हो रहा है। पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तानी जनता के प्रति उग्र विरोध व घृणा की धुरी पर ये आगे बढ़ेंगे।
इसीलिए उपरोक्‍त बाधाओं को दिखाकर यह कहना कि भारत में फासीवादी प्र‍वृतित्‍यों के और अधिक उत्कर्ष और फासीवाद के विजय का कोई खतरा मौजूद नहीं है यह गलत है। यह काफी खतरनाक भी है क्‍योंकि यह हमें आगाह और खतर के प्रति समय से पूर्व ही तैयार नहीं करता है बल्कि खतरे के प्रति आँख मूँद लेने की सलाह देता है। यह हमें सचेत नहीं अचेत बनाये रखता है। फासीवाद की मूल वजह आज का संकटग्रस्त और मुत्युशैया पर पड़ा विश्वपूँजीवाद है जो निस्संदेह न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में तरह-तरह की नव फासीवादी शक्तियों और आन्दोलनों के उभार की एक आम प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है। और हर परिस्थिति में यह अपने लिए रास्‍ता बनाने की कोशिश में लगेगा और लगा हुआ है। नव उदारवाद अपने आप में आर्थिक फासीवाद का एक रूप है जिसके समकक्ष और सापेक्ष एक राजनीतिक फासीवाद का जन्म स्वाभाविक है। नरेंद्र मोदी के नेत़ृत्व में भारतीय फासीवादी उभार का यह स्वरूप इसी वैश्विक परिदृश्य का एक अंश है, उसका एक सहउत्‍पाद है।
कुछ साथी और संगठन यह भी कहते हैं कि 2019 में भाजपा की हार हो जायेगी और फिर बहस का यह मुद्दा ही नहीं रहेगा। ये एकदम से भोले लोग हैं। क्‍योंकि यह भोलापन ही है कि ये इसे महज चुनावी हार-जीत और समीकरणों में ही देखते हैं। दरअसल हमारा विश्‍लेषण जमीनी स्थिति को देखते हुए होना चाहिए और चुनावी हाज-जीत के समीकरणों से इतर भी देखना चाहिए। 2019 में अगर भाजपा की हार हो जाती है तब भी इन शक्तियों ने जमीनी तौर पर जो ताकत हासिल कर ली है उसे मजदूर-मेहनतकश वर्ग के क्रांतिकारी हस्तक्षेप के अतिरिक्त किसी और शक्ति से खत्म किया जाना असंभव है। समस्त जनतांत्रिक निकायों का, पुलिस व खुफिया तंत्र का, नौकरशाही आदि का ये जिस तेजी से फासिस्टीकरण कर रहे हैं, आम जन साधारण के बीच ये जिस तरह का जहर फैलाने में सफल हुए हैं, जिस तरह से मजदूरों के बीच भी ये अपनी वैचारिक पैठ बनाने में सफल हुए हैं, जिस तरह से ये पूरे देश में लो इंटेनसिटी वाले फासिस्ट हमले चला रहे हैं, उससे कम से कम यह तो स्पष्ट हो ही जाना चाहिए कि इसको खत्‍म करने की क्षमता और इच्‍छा किसी अन्य बुर्जुआ दल के पास नहीं है और न ही हो सकती है। उल्टे, ये सभी विपक्षी दल किसी न किसी रूप में 'फासिस्ट' चरित्र वाले हैं और वे जमीनी तौर पर हो चुके फासीवादी तत्वों के विस्तार का इसतेमाल ही करेंगे न कि खात्मा करेंगे, खासकर जब वे सत्ता में होंगे। फासिज्म के समर्थक बड़े पूँजीपतियों की दूकानें इन सभी पार्टियों और दलों में सजी हैं हम यह भी जानते हैं। इसका मतलब यह है कि चुनाव में भाजपा के हारने के बावजूद भी फासीवादी शक्तियों को नष्‍ट करने का काम बचा रहेगा और कांग्रेस सहित ये सभी दल इन्‍हें नष्‍ट होने से बचायेंगे। क्‍या कांग्रेस ने अब तक फासीवादी ताकतों को देश में बनाये नहीं रखा? हम पाते हैं कि वे खत्‍म करने के बजाय प्रतिद्वंद्विता में रही है। जनवाद के मूल्य आज जितने अधिक कुचले जायेंगे, उसका उतना ही फायदा अन्य बुर्जुआ पार्टियाँ उठायेंगी जब वे सत्तासीन होंगी। 1947 के बाद कांग्रेस ने आ.एस.एस. को खाद-पानी देने का काम कभी बंद नहीं किया। आज स्थिति पूरी तरह स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस, सपा, बसपा से लेकर राजद, जेडीयू सरीखी पार्टियाँ सभी की सभी यह साबित कर चुकी हैं कि वे घोर जनविरोधी हैं और इसीलिए स्‍वभावत: जनवाद के नहीं फासीवाद के तरफ झुकी हुई हैं। ये सभी पूँजीवादी निरंकुशता के समर्थक हैं। और इनका यह चरित्र भाजपा और संघ से इनके सत्‍ता के लिए होने लाख विरोध के बावजूद भाजपा और संघ मार्का राष्ट्रवाद को ही किसी न किसी तरह आगे बढ़ाने के समर्थक हैं। इसीलिए 2019 में चुनाव में क्‍या होता है, एकमात्र इससे ही फासीवाद का निपटारा नहीं हो सकता है। हाँ, तीव्रता में कमी आ सकती है और आयेगी, क्‍योंकि जीतने वाली अन्‍य पार्टी या पार्टियों के गठबंधन तात्‍कालिक परिस्थिति में आम जनता की लोकप्रिय फासीवाद विरोधी भावना को 'एकजस्‍ट' करके चलना पड़ेगा, कम से कम कुछ दिन तक। लेकिन बड़ी पूँजी के हितों, जिनके ये सभी गुलाम हैं, की पूर्ति का दबाव जल्‍द ही इन्‍हें संघ और भाजपा के रास्‍ते पर डाल देगा। ऐसे भी सबसे बेहतर ढंग से और नंगई से ''यू टर्न'' कैसे किया जाता है भाजपा से ये सभी सीख चुके होंगे। कहने का तात्‍पर्य यह है कि 2019 में भाजपा की हार होती है, अगर होती है (जिसके बारे में आज मात्र कयास ही लगाये जा सकते हैं) तब भी फासीवादी शक्तियाँ न तो नष्‍ट होंगी और न ही इनके पुन: प्रत्‍यक्ष उभार की संभावना ही खत्‍म होगी।
साथियों, इसके अतिरिक्‍त बात यह भी है कि 21वीं सदी का फासीवाद हू-बहू बीसवीं शताब्दी के तीसरे-चौथे दशक के फासीवाद का दुहराव कदापि नहीं हो सकता है। ऐसा सोंचने वाले लोग जब समानता नहीं देखते हैं, तो फिर वे फासीवाद के सत्‍तासीन होने के तथ्‍य से ही इनकार कर देते हैं। जो एकदम साफ और स्‍पष्‍ट है उसे भी नहीं देख पाते। आज की परिस्थितियाँ उस समय की परिस्थिति‍यों से इतनी अधिक भि‍न्‍न हैं कि आज के फासीवादी उभार और उनके सत्‍तासीन होने के अर्थ और उसके बाह्य प्रभावों में काफी कुछ भिन्‍नता मिलेगी जो कि स्‍वाभाविक है। आज जो परिस्थिति‍ है उसमें फासीवादी एकदम से संसद को भंग कर देंगे और एक झटके में जनवाद को कुचल देंगे, यह न तो आवश्‍यक है और न ही संभव। ऐसा पहले भी कभी नहीं हुआ है। फासीवाद रंग और रूप में पहले भी एक एकसमान नहीं था। अलग-अलग देशों में यह अलग तरह से आया और अलग तरह का बाह्य रूप अख्तियार किया। आज भरत में वे तुरंत किसी देश से युद्ध की घोषणा ही कर देने की स्थिति में ही हैं। हाँ, युद्धोन्‍माद की स्थिति वे हमेशा बनाये रखेंगे और हम आज इसे बखूबी देख सकते हैं कि पाकिस्‍तान को लेकर किस तरह के युद्धोन्‍माद की स्थिति बनाये हुए हैं। जहाँ तक सच में युद्ध करने की बात है हम इसकी संभावना से भी एकदम से इनकार नहीं कर सकते हैं। यह कई अन्‍य तरह की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यहाँ हम दिमित्रोव द्वारा 1935 में पेश रिपोर्ट को देख सकते हैं जो एक साथ कई भ्रमों को दूर कर देता है। वे लिखते हैं –
''फासिज्म का विकास तथा स्वयं फासिस्ट तानाशाही हर देश विशेष की ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों और राष्ट्रीय विलक्षणताओं तथा उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति के अनुसार विभिन्न देशों में अलग-अलग रूप धारण करती है। कुछ देशों में, खासतौर पर उनमें जहाँ फासिज्म के पास व्यापक जनाधार नहीं है, तथा जहाँ स्वयं पूँजीपति वर्ग के खेमे के भीतर विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष अधिक उग्र है, फासिज्म फौरन संसद को समाप्त करने का साहस नहीं करता, बल्कि अन्य पूँजीवादी पार्टियों, साथ ही सामाजिक जनवादी पार्टियों को किंचित वैधता बनाये रखने देता है। अन्य देशों में, जहाँ शासक पूंजीपति वर्ग को शीघ्र ही क्रांति का विस्फोट हो जाने का डर रहता है, फासिज्म या तो फौरन ही सारी प्रतिद्वंद्वी पार्टियों और समूहों के खिलाफ आतंकशाही और उसका उत्पीड़न तेज कर के अपना निरंकुश राजनीतिक एकाधिकार कायम कर लेता है। जब फासिज्म की स्थिति खासतौर पर संगीन होती है, तो अपना आधार विस्तृत करने की कोशिश में, और अपने वर्ग चरित्र को बदले बगैर संसदवाद के भौंड़े दिखावे के साथ खुली आतंकवादी तानाशाही को संयुक्त करने में, यह चीज फासिज्म के आड़े नहीं आती।''
बीसवीं सदी का फासीवाद जिस तरह के पूँजीवादी संकट की ज़मीन से पैदा हुआ था वह आवर्ती पूँजीवादी संकट था जो उस समय तक की सबसे बड़ी मन्दी या महामंदी का कारण बना था। आज की परिस्थिति आवर्ती क्रम में आने वाले पूँजीवादी संकट से कहीं आगे निकल चुकी है। आज की लाक्षणिकता यह है कि विश्वपूँजीवाद लगातार संकट में रह रहा है। वह दीर्घकालिक मन्दी के दौर से गुज़र रहा है। जिस तरह उबड़-खाबड़ ढलान में थोड़े बहुत ऊँचे टीले होते हैं, उसी तरह विश्व अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक और सर्वजनीन संकट व मंदी की जिस अनवरत ढलान पर है उसमें यदा-कदा होने वाली ग्रोथ रेट में वृद्धि महज कुछ ऊँचे टीले भर हैं और मूल रूप से ये ऊभार अर्थव्यवस्था की अनवरत ढलान के हिस्से मात्र हैं। इसे 'टर्मिनल डिज़ीज़' भी कहा जा रहा है। ऐसे काल में बुर्जुआ जनवाद और नग्न धुर-दक्षिणपंथी बुर्जुआ तानाशाही (फासीवाद) के बीच अंतर समाप्तप्राय हो गया है जिसका अभिप्राय यह है कि आज का फासीवाद बुर्जुआ जनवाद के निकायों और उसकी संस्थाओं का उपयोग करके ही आगे बढ़ रहा है और बढ़ेगा, जब तक कि परिस्थितियाँ इसके पूरी तरह अनुकूल नहीं हो जाती हैं। आज हम देख सकते हैं कि वह बुर्जुआ जनवाद को उसके अंदर से ही समाप्त कर रहा है, उसकी जमीन व आत्मा को छीज रहा है, उसे खोखला और निस्सार बना रहा है। हम पाते हैं कि उन्नत ही नहीं पिछड़े पूँजीवादी देशों तक में फासीवादी शक्तियों, संगठनों और आन्दोलनों के जन्मने और फलने-फूलने लायक उर्वर भूमि आज मौजूद है। जैसा कि पहले गया है अर्थव्यवस्था पर वित्तीय पूँजी का निर्णायक वर्चस्व कायम हो चुका है और दीर्घकालिक आर्थिक संकट के चलते नव-उदारवादी नीतियों को लगातार जनसमुदाय पर लादे रखने की ज़रूरत पैदा हो गई है। ये ही वे चीजें हैं जो नव-फासीवादी उभारों के मुख्य स्रोत और कारक तत्व हैं। भूमंडलीकरण के बाद पैदा हुए मौजूदा वैश्विक संकट की यह स्थिति मौजूदा तौर पर फासीवाद को पूरे ग्लोब पर फैलने की बाध्यता पैदा कर दी है। दरअसल उनके लिए यह बाध्यता भी है और अवसर भी। और यह देशी व विदेशी दोनों तरह की वित्तीय पूँजी की डोर से अर्थात दूसरे शब्दों में साम्राज्यवादी पूँजी और देशी वित्तीय पूँजी दोनों से एक साथ बंधा है। यही कारण है कि जहाँ गत शताब्दी में फासीवादी उभार का मुख्य क्षेत्र विकसित पूँजीवादी विश्व था, वहीं आज के नव फासीवादी उभार के केंद्र साम्राज्यवादी विकसित देशों के अतिरिक्त पिछड़े पूँजीवादी देशों में भी पैदा ले रहे हैं।

Friday, 14 October 2016

युद्द का विरोध करें!

देशवाद का जहर, धार्मिक उन्माद से ज्यादा असरदार होता है खास खास मौकों पर! संस्कृति, जाति, आदि का तड़का इसे और असरदार बना देता है! नाज़ीवाद और हिटलर का सत्ता में आना, द्वितीय विश्व युद्ध उदहारण है! सत्ता धारी वर्ग जब संकट में होता ह, तब देशवाद का उन्माद औरजरुरत हो तो युद्ध भी आवश्यक होता है!
भारत, विश्व बाज़ार का हिस्सा बन चूका है, 1992 के 'आर्थिक सुधार' कार्यक्रम के बाद, कोंग्रेसी सरकार के अधीन. बाद के आये सरकारों ने भी उसी आर्थिक धारा को आगे बढाया! सुधार का मतलब मजदूरों के हक़ को मरना, किसानों के जमीं हड़पना! साथ साथ बढा अपराध, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, अन्धविश्वाश!
शोषित वर्ग का शोषण एकतरफा नहीं हो सकता. आन्दोलन तीव्र होने लगा! तत्कालीन समय में धर्म, जाति, छेत्रियता का असर कम हो चूका है! पाकिस्तानी आतंकवाद कोई नया मुद्दा नहीं था पर युरी की घटना ने मौका दिया सत्ताधारी वर्ग और विपक्ष को भी! देशवाद का हौवा, सेना के नाम का इस्तेमाल सभी करना चाहते हैं! कभी सोचा है, सेना के जवान कौन लोग हैं? हमारे ही मजदुर वर्ग और किसान के बेटे और बेटियां!
सेना एक शक्तिशाली, अनुशाषित यंत्र है, जो किसी भी देश के सुरक्षा के लिए आवश्यक है! पर उसका इस्तेमाल राजनीती के लिए खरतनाक है. यदि सेना के उच्च पदाधिकारी राजनीती में दखल करने लगे तो?
केजरीवाल ने राजनितिक लाभ या सही मन से मोदी की प्रशंसा की हो, पर यह भूल गया की भाजपा एक गन्दी बुर्जुआ पार्टी है; वोट और सत्ता के लिए कुछ भी कर कर सकती है, कोंग्रेस से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं! 'आप' का यह बयां एक बचकाना ही नहीं, खतरनाक साबित हुआ! जनता का मुख्य मुद्दा गायब हो गया और सत्ताधारी वर्ग, विपक्ष के साथ विजयी हुआ!
अभी क्रांतिकारी पार्टी का एक ही मुद्दा होना चाहिए, पूंजीवाद के असली चरित्र को उजागर करना, मजदुर वर्ग और किसान को एकताबद्द करना, शोषण के खिलाफ आन्दोलन तीव्र करना, परजीवियों का खात्मा करना, जनता का सही प्रजातंत्र स्थापित करना!

Thursday, 13 October 2016

Home राजकीय भारत की GDP के अंक FAKE, बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई 7.5 की वृद्धि... राजकीयराष्ट्रीयव्यापार भारत की GDP के अंक FAKE, बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई 7.5 की वृद्धि दर: अमेरिका

पूरा आलेख पढ़ें:- http://www.indianationalnews.com/us-parliament-say-india-gdp-is-fake-bjp-narendra-modi/#comment-100

आंकड़ो की हेरा फेरी केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में हो रहा है! खासकर 2008 के बाद से पूंजीवादी आर्थिक सलाहकार बदहवासी में आंकड़ों के साथ छेड़खानी कर रहे हैं और जनता को दिखाने की कोशिश कर रहे हैं की सबकुछ ठीक है! देखा ही होगा जब स्टॉक मार्केट में जबरदस्त गिरावट आती है तो सरकार कूद पड़ती है की निवेशक घबराएँ नहीं; जैसे बुडे हुए करोड़ों अरबों पैसे वापस आ जायेंगे!
अमेरिका की टिपण्णी इसलिए नहीं है की भारत अपने आंकड़े ठीक करे बल्कि इसलिए है की दबाव बनाये रखे! मजदुरों के 'सुरक्षा' में बने कानूनों की धज्जी उड़ा दी है मोदी सरकार ने और किसानों के जमीं हड़पने के कानून जो कोंग्रेस ने ड्राफ्ट की थी, को पारित कर दिय है! ऍफ़ दी आई को बेशर्मी से पारित किया! फिर भी वैश्विक आर्थिक मंदी में अमेरिकी कंपनी अपने मुनाफा दर और मुनाफा नहीं बढ़ा पा रहे हैं, उन्हें और आसान तरीका चाहिए, लुटने का!
पुरे यूरोप में इस 'सुधार' का जबरदस्त विरोध हो रहा है और भारत के मजदुर वर्ग और किसान ज्यादा पीछे नहीं हैं! देखना है मोदी और आर एस एस किस हद तक सफल होते हैं अपने अमेरिकी और भारतीय मालिक को खुश करने में? हाँ, एक बात और है गौर करने की! धर्म, जाति, व्यक्ति पूजा पूरा सफल नहीं हुआ है, मजदुर वर्ग और किसानों के एकता तोड़ने में, तो भारत पाकिस्तान का मुद्दा आगे लाया गया है! देश वाद भी जबरदस्त मुद्दा है पूंजी के चमचों के पास जनता के मुख्य मुद्दा को पीछे करने का जैसे हिटलर ने किया था!
हम क्या करें? या कोई फिल्म नहीं चल रहा है, ख़त्म होने पर घर आ जाये और फिल्म निर्देशक पर टिपण्णी करें! यहाँ सवाल है करोडो के मौत और जीवन का!
आप खुद निर्णय करें किसके साथ हैं; 95% या फिर 5% परजीवियों के साथ!!

Saturday, 4 June 2016

Scientific Socialism: परिवर्तन प्रकृति और समाज का नियम है!

Scientific Socialism: परिवर्तन प्रकृति और समाज का नियम है!: परिवर्तन तो प्रकृति और समाज का नियम है। चीज़ें लगातार बदलती रहती हैं। बदलाव की क्रमि‍क प्रक्रिया लगातार जारी रहती है और बीच-बीच में क्रांति...

बदलाव तो स्वाभाविक है, चाहें या न चाहें!

जरुरत है बदलाव को उस संभव रास्ते पर चलाने को, जहाँ समाज प्रगतिशील रहता है, आगे बढ़ता है, समाज के हर सदस्य उस विकास का भागिदार होते है, हर शोषण का समाप्ति होता है, अन्धविश्वास से दूर होते हैं!


Friday, 3 June 2016

Fascism: Unite, Resist, Fight & Demolish!

Its not only the education, where fascism is attacking in planned and sometimes even in unplanned fashion, but in all fields of state and social sections; be it CAG, Judiciary, Bureaucracy, Police and not to talk of 'uses' of religion, caste, nation!
When ideology grips the mass, it becomes a material force! It is happening in India, world over, the tilt of mass to Right, towards religiosity, national chauvinism, casteism; in short, all the evils which are anti working class, peasants!
Now, that brings us to the political economy! Few examples will suffice! ST rising to 15%, Petrol & diesel prices going up, labour laws & land acquisition acts following dictates of IMF, World Bank & the imperialist masters!
By the way, it is worth noticing that BJP managed less than 20% of total eligible voters and captured the state power! Will revolutionaries manage that magical figure, can not they effect a revolution and change the society from being unjust to just?
So, let us understand the political economy, social conditions holistically; unite, educate ourselves, revolt against the present and change the society for an exploitation free society!

Sunday, 22 May 2016

भारत माता- हजारी प्रसाद दि्वेदी

हम आज भी काल्‍पनिक भारत माता का जय निनाद करते जा रहे हैं। भारत माता वस्‍तुत: क्‍या है, यह समझने की चेष्‍टा बहुत कम हो रही है। पूर्व और पश्चिम में जिसप्रकार की जन-जागृति हो रही है, उसे देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भारत माता जिस दिन अपने कोटि-कोटि दलित, हीन, निरन्‍न, निर्वस्‍त्र बालकों को लेकर जाग पड़ेगी, उस दिन की हालत कल्‍पना से बाहर होगी। उस दिन के लिए हमें अभी से तैयार रहना चाहि‍ए।
भारतवर्ष क्‍या है? हमें इस बात को अच्‍छी तरह जान लेना चाहिए कि भारतवर्ष उन करोड़ों दलित और मूक जनता से अभिन्‍न है, जिन्‍हें छूने से भी पाप अनुभव किया जाता है।
-- हजारी प्रसाद दि्वेदी , 'अशोक के फूल'(लोकभारती,2008) में शामिल लेख 'प्रायश्चि‍त के फूल', पृ.20-21

फासीवाद राष्ट्रवाद नहीं बल्कि पूंजीवाद का विकृत रूप है, जहाँ तानाशाही पूंजीपतियों का होता है! मजदुर वर्ग और किसान का भयानक शोषण होता है! फिर भी इसके छोटे अंश को जाति, देश, धर्म, व्यक्ति पूजा के अधार पर कुछ खास सुविधाएँ दी जाती हैं और बहुमत को दबाया जाता है! राज्य के द्वारा भी उन्हें दबाने का पूरा काम होता है!
यदि गुलामी और मज़बूरी है तब भी समझे और अपना रास्ता तय करे!
#Socialism

Thursday, 14 April 2016

राहुल सांकृत्यायन: धर्म

चाहे आप कितना ही परिष्किृत करना चाहें, शुद्ध से शुद्ध बना दें, धर्म पुराने का पूजक और भविष्य की प्रगति का विरोधी रहेगा ही। वह तो श्रद्धा और भक्ति के नाम पर हमारे गले में मुर्दा बाँधने का ही प्रयत्न करेगा। यह संसार जो प्रतिक्षण परिवर्तित हो रहा है, और परिवर्तन भी ऐसा कि इसका अतीत हमेशा अतीत ही रहेगा, वर्तमान रूप नहीं धारण कर सकेगा। ऐसी स्थिति होने पर स्थिरतावादी धर्म हमारे कभी सहायक नहीं हो सकते। जगत की गति के साथ हमें भी सरपट दौड़ना चाहिए, किन्तु धर्म हमें खींचकर पीछे रखना चाहते हैं।
-- राहुल सांकृत्यायन (साम्यवाद ही क्यों?)

Saturday, 26 March 2016

चाटुकारों का गीत

चाटुकारों का गीत
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चल ठाठ कर , चल ठाठ कर
आका के तलवे चाटकर...
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....

'जय हो' से हम आबाद हैं
बातों के हम उस्ताद हैं
हमलोग सत्ता -पक्ष में
हम ही खड़े प्रतिपक्ष में
हम हैं सभी सरकार में
हाजिर हैं हर दरबार में
ज्ञानी हैं ,प्रोफेसर हैं हम
अकड़े - तने अफ़सर हैं हम
हम ही हैं काले कोट में
कभी सामने , कभी ओट में
हम सारे मैनेजर जने
कानून के भूने चने
मकसद तो अपना एक है
बस एक सबकी टेक है
हुक्का कभी ना बंद हो
थैली का छन- छन छंद हो
चल माल-मत्ता झाड़ लें
जनता की पाकिट मार लें
बस ऐश हो , यूँ बैठकर
इस चापलूसी खाट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर.....
रियालिटी का सेटिंग हैं हम
टी. आर. पी. रेटिंग हैं हम
कुछ झूठ हो , कुछ साँच हो
दरबारी ठुमका नाच हो
तिल को दिखा दें ताड़ में
सच जाए चूल्हा - भाड़ में
गर बैग भरकर नोट हो
तो चाहे कोई खोट हो
दंडवत चरण में लोटकर
चारण - वचन में पोटकर
यशगान उनके गाएँगे
जितना खिलाएँ ,खाएँगे
सिंद्धांतों के तकुवे पे हम
बारीक सूते कातते
पूंजी की रस्सी बांटते
जन- जन को कसते- काटते
कुछ डांट खाते , डांटते
बेशर्मी अपना धर्म, बस-
खींसें निपोरो डांट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....
गलथेथरी के मास्टर
बहसों के सच्चे फाइटर
तर्कों के चाक़ू भाँजते
कुतर्क मलते - माँजते
तरकश में अपने तीर सब
हम अपने रण के वीर सब
हम रात को दिन कर दिए
पतझड़ में सावन भर दिए
मुद्रा का सारा तर्क है
दिन , रात में क्या फर्क है
पंजे लड़ाते हाथ में
पर चाय पीते साथ में
है गर्व कि हम रेंकते
आका की रोटी सेंकते
बस भौंकते हैं कुकुर सा
एक- दूसरे को काट कर
अपनी तो भाई एक धुन-
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर
आका के तलवे चाट कर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर .....
- ---------आदित्य कमल

Tuesday, 15 March 2016

Poem by Nazim Hikmet

A poem by Nazim Hikmet, very relevant in the present context :
“Yes, I am a traitor, if you are a patriot, if you are a defender of our homeland,
I am a traitor to my homeland, I am a traitor to my country.
If patriotism is your farms,
if the valuables in your safes and your bank accounts is patriotism,
if patriotism is dying from hunger by the side of the road,
if patriotism is trembling in the cold like a cur and shivering from malaria in the summer,
if sucking our scarlet blood in your factories is patriotism,
if patriotism is the claws of your village lords,
if patriotism is the catechism, if patriotism is the police club,
if your allocations and your salaries are patriotism,
if patriotism is American bases, American bombs, and American missiles,
if patriotism is not escaping from our stinking black-minded ignorance,
then I am a traitor.
Write it over three columns, in a pitch-black screaming streamer,
Nazim Hikmet is continuing to be a traitor, STILL!”

Saturday, 20 February 2016

सिक्यूरिटी एजेंसी: भारत

सिक्यूरिटी एजेंसी भारत मे सबसे बड़ी या दूसरी प्राइवेट सर्विस है, जहां समय से पहले निकले 37-38 वर्षीय सैनिक काम करते है 5-7 हज़ार रुपये प्रति माह पर! भयानक भ्रष्टाचार है यहाँ, दलालों की ही चलती है! आर्मी द्वारा जल्दी रिटायर्ड आफीसर भी यहाँ लगाये जाते है, पर उनका काम भी यही दलाल करते है! 
वन रैंक वन पेंसन का चटनी बना दिया कॉंग्रेस और भाजपा ने, अब शोषित होने के अलावा कोई चारा नही बेचारों के पास, कभी देखें इन्हे, भिखमंगे बन गये है यह देश के लाल और देश को लूटने वालों के यहाँ काम करने को मजबूर हैं!

"रिलायंस ने अपनी संपत्तियों की सुरक्षा के लिए 16,000 पूर्व सैन्यकर्मियों को भर्ती किया है..."

http://navbharattimes.indiatimes.com/business/business-news/16000-former-indian-military-personnel-guard-reliance-industries-assets/articleshow/51066522.cms 

Saturday, 16 January 2016

मैथिली शरण गुप्त: कविता

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो