चाटुकारों का गीत
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चल ठाठ कर , चल ठाठ कर
आका के तलवे चाटकर...
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....
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चल ठाठ कर , चल ठाठ कर
आका के तलवे चाटकर...
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....
'जय हो' से हम आबाद हैं
बातों के हम उस्ताद हैं
हमलोग सत्ता -पक्ष में
हम ही खड़े प्रतिपक्ष में
हम हैं सभी सरकार में
हाजिर हैं हर दरबार में
ज्ञानी हैं ,प्रोफेसर हैं हम
अकड़े - तने अफ़सर हैं हम
हम ही हैं काले कोट में
कभी सामने , कभी ओट में
हम सारे मैनेजर जने
कानून के भूने चने
मकसद तो अपना एक है
बस एक सबकी टेक है
हुक्का कभी ना बंद हो
थैली का छन- छन छंद हो
चल माल-मत्ता झाड़ लें
जनता की पाकिट मार लें
बस ऐश हो , यूँ बैठकर
इस चापलूसी खाट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर.....
रियालिटी का सेटिंग हैं हम
टी. आर. पी. रेटिंग हैं हम
कुछ झूठ हो , कुछ साँच हो
दरबारी ठुमका नाच हो
तिल को दिखा दें ताड़ में
सच जाए चूल्हा - भाड़ में
गर बैग भरकर नोट हो
तो चाहे कोई खोट हो
दंडवत चरण में लोटकर
चारण - वचन में पोटकर
यशगान उनके गाएँगे
जितना खिलाएँ ,खाएँगे
सिंद्धांतों के तकुवे पे हम
बारीक सूते कातते
पूंजी की रस्सी बांटते
जन- जन को कसते- काटते
कुछ डांट खाते , डांटते
बेशर्मी अपना धर्म, बस-
खींसें निपोरो डांट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....
गलथेथरी के मास्टर
बहसों के सच्चे फाइटर
तर्कों के चाक़ू भाँजते
कुतर्क मलते - माँजते
तरकश में अपने तीर सब
हम अपने रण के वीर सब
हम रात को दिन कर दिए
पतझड़ में सावन भर दिए
मुद्रा का सारा तर्क है
दिन , रात में क्या फर्क है
पंजे लड़ाते हाथ में
पर चाय पीते साथ में
है गर्व कि हम रेंकते
आका की रोटी सेंकते
बस भौंकते हैं कुकुर सा
एक- दूसरे को काट कर
अपनी तो भाई एक धुन-
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर
आका के तलवे चाट कर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर .....
- ---------आदित्य कमल
बातों के हम उस्ताद हैं
हमलोग सत्ता -पक्ष में
हम ही खड़े प्रतिपक्ष में
हम हैं सभी सरकार में
हाजिर हैं हर दरबार में
ज्ञानी हैं ,प्रोफेसर हैं हम
अकड़े - तने अफ़सर हैं हम
हम ही हैं काले कोट में
कभी सामने , कभी ओट में
हम सारे मैनेजर जने
कानून के भूने चने
मकसद तो अपना एक है
बस एक सबकी टेक है
हुक्का कभी ना बंद हो
थैली का छन- छन छंद हो
चल माल-मत्ता झाड़ लें
जनता की पाकिट मार लें
बस ऐश हो , यूँ बैठकर
इस चापलूसी खाट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर.....
रियालिटी का सेटिंग हैं हम
टी. आर. पी. रेटिंग हैं हम
कुछ झूठ हो , कुछ साँच हो
दरबारी ठुमका नाच हो
तिल को दिखा दें ताड़ में
सच जाए चूल्हा - भाड़ में
गर बैग भरकर नोट हो
तो चाहे कोई खोट हो
दंडवत चरण में लोटकर
चारण - वचन में पोटकर
यशगान उनके गाएँगे
जितना खिलाएँ ,खाएँगे
सिंद्धांतों के तकुवे पे हम
बारीक सूते कातते
पूंजी की रस्सी बांटते
जन- जन को कसते- काटते
कुछ डांट खाते , डांटते
बेशर्मी अपना धर्म, बस-
खींसें निपोरो डांट पर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर....
गलथेथरी के मास्टर
बहसों के सच्चे फाइटर
तर्कों के चाक़ू भाँजते
कुतर्क मलते - माँजते
तरकश में अपने तीर सब
हम अपने रण के वीर सब
हम रात को दिन कर दिए
पतझड़ में सावन भर दिए
मुद्रा का सारा तर्क है
दिन , रात में क्या फर्क है
पंजे लड़ाते हाथ में
पर चाय पीते साथ में
है गर्व कि हम रेंकते
आका की रोटी सेंकते
बस भौंकते हैं कुकुर सा
एक- दूसरे को काट कर
अपनी तो भाई एक धुन-
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर
आका के तलवे चाट कर
चल ठाठ कर , बस ठाठ कर .....
- ---------आदित्य कमल