देशवाद का जहर, धार्मिक उन्माद से ज्यादा असरदार होता है खास खास मौकों पर! संस्कृति, जाति, आदि का तड़का इसे और असरदार बना देता है! नाज़ीवाद और हिटलर का सत्ता में आना, द्वितीय विश्व युद्ध उदहारण है! सत्ता धारी वर्ग जब संकट में होता ह, तब देशवाद का उन्माद औरजरुरत हो तो युद्ध भी आवश्यक होता है!
भारत, विश्व बाज़ार का हिस्सा बन चूका है, 1992 के 'आर्थिक सुधार' कार्यक्रम के बाद, कोंग्रेसी सरकार के अधीन. बाद के आये सरकारों ने भी उसी आर्थिक धारा को आगे बढाया! सुधार का मतलब मजदूरों के हक़ को मरना, किसानों के जमीं हड़पना! साथ साथ बढा अपराध, भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, अन्धविश्वाश!
शोषित वर्ग का शोषण एकतरफा नहीं हो सकता. आन्दोलन तीव्र होने लगा! तत्कालीन समय में धर्म, जाति, छेत्रियता का असर कम हो चूका है! पाकिस्तानी आतंकवाद कोई नया मुद्दा नहीं था पर युरी की घटना ने मौका दिया सत्ताधारी वर्ग और विपक्ष को भी! देशवाद का हौवा, सेना के नाम का इस्तेमाल सभी करना चाहते हैं! कभी सोचा है, सेना के जवान कौन लोग हैं? हमारे ही मजदुर वर्ग और किसान के बेटे और बेटियां!
सेना एक शक्तिशाली, अनुशाषित यंत्र है, जो किसी भी देश के सुरक्षा के लिए आवश्यक है! पर उसका इस्तेमाल राजनीती के लिए खरतनाक है. यदि सेना के उच्च पदाधिकारी राजनीती में दखल करने लगे तो?
केजरीवाल ने राजनितिक लाभ या सही मन से मोदी की प्रशंसा की हो, पर यह भूल गया की भाजपा एक गन्दी बुर्जुआ पार्टी है; वोट और सत्ता के लिए कुछ भी कर कर सकती है, कोंग्रेस से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं! 'आप' का यह बयां एक बचकाना ही नहीं, खतरनाक साबित हुआ! जनता का मुख्य मुद्दा गायब हो गया और सत्ताधारी वर्ग, विपक्ष के साथ विजयी हुआ!
अभी क्रांतिकारी पार्टी का एक ही मुद्दा होना चाहिए, पूंजीवाद के असली चरित्र को उजागर करना, मजदुर वर्ग और किसान को एकताबद्द करना, शोषण के खिलाफ आन्दोलन तीव्र करना, परजीवियों का खात्मा करना, जनता का सही प्रजातंत्र स्थापित करना!
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