साथी मुकेश का विश्लेषण "आज ये सड़ा हुआ पूंजीवाद है, सड़े हुए भोजन की तरह तंदुरुस्ती नहीं, बीमारियां पैदा करता है|"
मेरी टिपण्णी:
यानि पूंजीवाद का ही एक रूप, पर अति सडा हुआ और खुनी रूप; फासीवाद का आगमन!
फासीवाद के आगमन का मतलब है की पूंजीवाद की बुराइयाँ और लक्षण गुणात्मक रूप से बढ़ चढ़ कर होंगी और मजदूर वर्ग पर आक्रमण भी बढेगा! जहाँ यह दिखता है कि पूंजीवाद अपने अंतर्विरोधों को सामान्य तरीकों से, पुराने संविधान और "प्रजतान्त्रिक" नुस्खों से समाधान करने में असक्षम है, वही सर्वहारा वर्ग के असंतोष और विरोधों को भी पुराने तरीकों से नहीं दबाया जा सकता है!
इसका नतीजा है, मजदूरों और किसानों के प्राप्त प्रजातान्त्रिक अधिकार, आर्थिक आधार पर कुठाराघात! 45 श्रम कानून, पर्यावरण कानून को ध्वस्त करना, जमीन अधिग्रहण कानून लाना, नोटबंदी, जीएसटी लाना, बेल इन को लाने की कवायद, बैंकों द्वारा हमारे अपने ही पैसे निकालने पर हमें दण्डित और कंट्रोल करना, पेट्रोल, खाद्य सामग्रियों, मूल भुत अवश्यकतातों को एकाधिकार कीमत पर बेचना, आदि दिख रहा है!
पर इन सबके लिए समाज के एक हिस्से को पैसे और प्रतिगामी और मजदूर विरोधी विचारधारा द्वारा खरीदना, यानि एक "सामाजिक आन्दोलन" खड़ा करना, जनता के विरुद्ध ही, फासीवाद का ही गुण है! फासीवाद के जनक मुसोलिनी, हिटलर ने यही तो किया था, बुर्जुआ वर्ग से मिली भगत कर. हिटलर को बुर्जुआ सलाहकारों ने भाषण को परिमार्जित करना सिखाया, यहूदियों के खिलाफ काल्पनिक भय दिखाना सिखाया, जर्मन आत्म गौरव के लिए "आर्य" के महान होने की कल्पना की, जिसे मिडिया और सरकारी तंत्र ने आधार दिया!
क्या यह सब आरएसएस और इसके देशी, विदेशी मालिकों ने नहीं किया? धर्म, जाती, व्यक्तिवाद, देशवाद आधार बना इन परजीवियों का. आज तो सोशल मिडिया, अरबों खरबों पैसे की ताकत, फोटो शॉप की क्षमता बेमिसाल है, इन फासीवादियों के पास. सरकारी तंत्र, पुलिस, न्यायलय और प्रशाषण के रूप में जनता के खिलाफ और मजबूत ताकत बनता है!
खैर, एक बात और यहाँ जोड़ना आवश्यक है! जो ताकत फासीवाद के साथ है, उसी का पलट वार उसके खिलाफ हमारे साथ होगा, क्रन्तिकारी उफान के दौरान! यानि जो ताकत पूंजीवाद या फासीवाद का है, उसका निधेध इसी समाज में है, नाकि बाहर से लाना पड़ेगा!
आज के मजदूर, किसान, शोषित सामाजिक समुह जाती और धर्म के आधार पर, श्रमिक महिलाएं, आदिवासी, सरकारी और गैर सरकारी कर्मचारी, ही खड़े होंगे विरोध करने के लिए. 1975, 2012 के आन्दोलन भी जनता ने ही किया था, हाँ, इसका नेत्रित्व बुर्जुआ वर्ग के ही दलों के पास रहा और नतीजा, फिर से बुर्जुआ शाषण ही रहा. इसका उदाहरण ईरान में अमेरिकी पिट्ठू, राजा शाह के खिलाफ जन आन्दोलन पर, नया शाषक बना अयातुल्ला खुमैनी और पूंजीपतियों और मुल्लों के हाथ, जिसका नतीजा मजदूर वर्ग और महिलाओं पर भयानक आक्रमण!
फासीवाद निश्चित रूप प्रगतिशील विरोधी आन्दोलन है, सड़े गले पूंजीवाद को बचाने के लिए, पर इसमे सामाजिक, प्रजन्तान्त्रिक मूल्यों (जो भी था, पर आज से बेहतर था) का ह्रास होगा, उत्पादक शक्तियों का पतन होगा. फिर भी इसी के गर्भ से नए आन्दोलन की संभावना है और वह क्रांति का रूप ले सकती है, यदि एक क्रन्तिकारी पार्टी, क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ इस आन्दोलन को नेत्रित्व दे सके!
No comments:
Post a Comment