Monday, 5 October 2015

चुनावी जातीय गठबंधन: बिहार

  • कामरेड अजय की एक सटीक टिप्पणी।
    आज के परिप्रेक्ष्‍य में, हर तरह का चुनावी जातीय गठबंधन उन जातियों के आगे बढ़े हुए अमीरों का अर्थात उन जातीय समूहों के अंदर के पूंजीवादी तत्‍वों और संस्‍तरों का गठबंधन होता है। आज के बिहार की जमीनी सामाजिक सच्‍चाई में यह बात निर्विवाद है। यह भी निर्विवाद है कि भारत में उँची जाति‍यों का गठबंधन यकीन वैसे पूँजीवादी कुलीनों का गठबंधन है जो तमाम पुरानी कुरीतियों, कुंठाओं और कुसंस्‍कृतियों पर आधारित होता है और इसीलिए निस्‍संदेह पिछड़ी व दलित जातियों आ...दि के गठबंधन से अधिक तिकड मी और प्रतिक्रियावादी होता है। इसका अंदाजा इन दिनों बिहार के चुनावी वातावरण में निर्मित इस तिकड़मी माहौल से लगाया जा सकता है कि आज कोई भी ऊंची जातियों के जातीय गठबंधन, चाहे वह शुरुआती सालों में कांग्रेस ने किया हो या अब बीजेपी कर रही है, को जाति-केंद्रित गठबंधन नहीं मानता लेकिन वंचित और 'नीची' जातियों के गठबंधन को जिसका नेतृत्व नीतीश कुमार और लालू प्रसाद कर रहे हैं, को हमेशा ही जाति आधारित गठबंधन माना जाता है। आज अगड़ी जातियों की कुलीन मानसिकता लालू विरोध में पहले से भी कहीं अधिक दिखती है। यह जमीनी सच्‍चाई है और इसका श्रेय निश्चित ही भाजपा को जाता है।
    मित्रों, यह बर्ताव बिहार में चुनावों में एक दूसरे से प्रतिस्‍पर्धा कर रहे दो पूँजीवादी गठबंधनों के प्रति एक ऐसा कुलीपक्षीय दोहरा बर्ताव है जिसे प्रगतिशील, जनवादी तथा न्‍याय के पक्षधरों को कभी स्वीकार नहीं होना चाहिए।

1 comment:

  1. Nice analysis! Defeat caste line, raise banner of class line! Worker's unity only way to defeat capitalism!

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