आरएसएस का आधार ही देश द्रोह है, औरत विरोधी, मजदूर और किसान विरोधी है. इस समय जबकि दुनिया में दक्षिणपंथी विचारधाराओं को बढ़त मिल रहा है, निश्चित तौर पर आरएसएस भी होड़ में है अपनी सत्ता को मजबूत करने, देश में जनता के लूट में हिस्सा लेने के लिए और इस होड़ में हैं पैसे पर काम करने वाले अधकचरे, डरपोंक, मानसिक विकृत लम्पट और गुंडे. जिसकी भाषा थोड़ी बेहतर है और लिख सकता है वह ऐसे आईटी केंद्र का लीडर बनता है और बाकि सब से ज्यादा कमाता है. ऐसे गुंडे सडकों पर भी पाए जाते हैं, भिन्न भिन्न नामों से, जैसे बजरंग दल आदि! इस प्रतिक्रियावादी विचारों और लम्पटों का सत्ता में आना अनायास नहीं हुआ. 2008 के विश्व मंदी के बाद मजदूर वर्ग और किसानों ने भारी विरोध किया अपनी छटनी का, मुलभुत सुविधायों में कटौती का, शिक्षा और स्वास्थ्य में मद के कमी का. पर सही नेत्रित्व ना होने के कारन हार गये और बड़े पूंजीपतियों और उनके चाकरों ने विद्रोह की कमान अपने हाथ में ले ली. भारत में भी 2012 के आन्दोलन और जनता के आन्दोलन का यही ह्रस्व हुआ. अब तो फासीवाद की इतनी हिम्मत हो गयी है की चुनाव हारने के बावजूद इसकी सरकार बन रही है, जैसे, गोवा, मणिपुर और अब बिहार में. सारे कहने का मतलब यह है की फासीवाद और इसके साथ सरकार और सरकारी मशीन, सिपाही, प्रशाशन, न्यायलय और इनके भाड़े के गुंडे मिहनतकश जनता का शोषण कर रहे हैं, अपने मालिक के लिए, बड़े पूंजीपति, वित्तीय और विदेशी मालिकों के लिए और विरोध करने पर प्रतारणा करते हैं, दलाली पर! इसका विरोध केवल चुनाव द्वारा गलत रणनीति है, क्यूंकि उसमे हारना ही है! विशाल मजदूर वर्ग, किसान, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी, महिला के एकता और संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है, इस बढ़ते राक्षस को ख़त्म करने के लिए. धर्म, जाति, छेत्र, व्यक्तिवाद, देशावाद के आधार पर एकता को नकारो. सुधारवाद को नकारो. क्रांति ही रास्ता है. भगत सिंह जिंदाबाद!
आरएसएस का आधार ही देश द्रोह है, औरत विरोधी, मजदूर और किसान विरोधी है. इस समय जबकि दुनिया में दक्षिणपंथी विचारधाराओं को बढ़त मिल रहा है, निश्चित तौर पर आरएसएस भी होड़ में है अपनी सत्ता को मजबूत करने, देश में जनता के लूट में हिस्सा लेने के लिए और इस होड़ में हैं पैसे पर काम करने वाले अधकचरे, डरपोंक, मानसिक विकृत लम्पट और गुंडे. जिसकी भाषा थोड़ी बेहतर है और लिख सकता है वह ऐसे आईटी केंद्र का लीडर बनता है और बाकि सब से ज्यादा कमाता है. ऐसे गुंडे सडकों पर भी पाए जाते हैं, भिन्न भिन्न नामों से, जैसे बजरंग दल आदि!
ReplyDeleteइस प्रतिक्रियावादी विचारों और लम्पटों का सत्ता में आना अनायास नहीं हुआ. 2008 के विश्व मंदी के बाद मजदूर वर्ग और किसानों ने भारी विरोध किया अपनी छटनी का, मुलभुत सुविधायों में कटौती का, शिक्षा और स्वास्थ्य में मद के कमी का. पर सही नेत्रित्व ना होने के कारन हार गये और बड़े पूंजीपतियों और उनके चाकरों ने विद्रोह की कमान अपने हाथ में ले ली. भारत में भी 2012 के आन्दोलन और जनता के आन्दोलन का यही ह्रस्व हुआ. अब तो फासीवाद की इतनी हिम्मत हो गयी है की चुनाव हारने के बावजूद इसकी सरकार बन रही है, जैसे, गोवा, मणिपुर और अब बिहार में.
सारे कहने का मतलब यह है की फासीवाद और इसके साथ सरकार और सरकारी मशीन, सिपाही, प्रशाशन, न्यायलय और इनके भाड़े के गुंडे मिहनतकश जनता का शोषण कर रहे हैं, अपने मालिक के लिए, बड़े पूंजीपति, वित्तीय और विदेशी मालिकों के लिए और विरोध करने पर प्रतारणा करते हैं, दलाली पर!
इसका विरोध केवल चुनाव द्वारा गलत रणनीति है, क्यूंकि उसमे हारना ही है! विशाल मजदूर वर्ग, किसान, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी, महिला के एकता और संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है, इस बढ़ते राक्षस को ख़त्म करने के लिए. धर्म, जाति, छेत्र, व्यक्तिवाद, देशावाद के आधार पर एकता को नकारो. सुधारवाद को नकारो. क्रांति ही रास्ता है. भगत सिंह जिंदाबाद!